कटनी : बरही-बड़वारा रेत खदान से अनेक जिलों मे अवैध रेत खनन करके विक्रय किया जा रहा है, भारत सरकार की निर्धारित गाईडलाईन के अनुसार कटनी जिला प्रशासन द्वारा हर प्रकार से नियमों की अनदेखी की जा रही है, बिना खसरा रकवा इत्यादि चिन्हित किए ठेकेदार कंपनी अपनी मर्जी से बेहिचक उत्खनन कर रहे है।
भारत सरकार को भी रॉयल्टी से मिलने वाले राजस्व से खिलवाड़ हो रहा है राजस्व जमा हो या ना हो अधिकारियों के पास जमा हो जाना चाहिए। अधिकारियों से लेकर राजनैतिक गलियारे तक सब तय कर दिया गया है जो समय पर पहुंचा दिया जाता है। सत्ताधारी हो या विपक्ष सब मूक दर्शक हैं।
भारत सरकार की रायल्टी की चोरी का तरीका भी अनोखा है जब भी वाहनों के ड्राइवरों द्वारा दस का नोट दिखाकर संकेत दे दिया जाता है की उक्त वाहन रेत ठेकेदार से जुड़े लोगों की है, जिसे रोकना नहीं है। फिर इस वाहन को रोकने की हिमाकत जिला प्रशासन नहीं करता, जिले के मुखिया बात कुछ भी करें लेकिन जानकारी सब कुछ है, बिना जानकारी के इतना बडा कारोबार कैसे फलता फूलता है, करोड़ों का व्यापार रोज अवैध हो रहा है।
भारत में तीव्र शहरीकरण के कारण रेत की मांग और अवैध उत्खनन में तेजी से वृद्धि हुई है। अवैध खनन के कारण नदियों का प्राकृतिक प्रवाह, पारिस्थितिक तंत्र और जलीय जैव-विविधता गंभीर रूप से प्रभावित हो रही है, इस गतिविधि से राजस्व की भी हानि हो रही है और रेत माफियाओं का वर्चस्व बढ़ रहा है, खनिज निरीक्षकों की लापरवाही के कारण अवैध उत्खनन और राजस्व में रिसाव की घटनाएं सामने आती रही हैं,जहाँ स्वीकृत स्थलों से बाहर भी खनन होता रहा है और समर्पण के बाद भी रेत का उत्खनन होता है और प्रशासन मूक बना रहता है, कार्यवाही के नाम पर सिर्फ दिखावा होता है।
नदी तल में 7 से 15 सेंटीमीटर प्रति वर्ष तक की गिरावट और भू-कटाव में वृद्धि के साथ भूजल में कमी के परिणाम देखने को मिले हैं। रेत उत्खनन की गहराई 3 मीटर या भूजल स्तर तक ही सीमित होनी चाहिए और यह केवल दिन के उजाले में मानवीय श्रम या मशीनों द्वारा किया जाना चाहिए। अवैध खनन से मध्यप्रदेश जैसे राज्यों में प्रतिवर्ष करोड़ों का नुकसान हो रहा है।
रेत की अवैध एवं अनियंत्रित खुदाई से पारिस्थितिक और सामाजिक दुष्प्रभाव पड़ रहे हैं, रेत ठेकेदारी तंत्र से जुड़े लोगों तथा स्थानीय पंच सरपंचों ने मिलकर ग्रामीण फिजाओं को बुरी तरह प्रभावित कर दिया है।
अब 70 प्रतिशत समुद्र तट रेत विहीन हो चुके हैं,नदियों से अवैध और अनियंत्रित रेत उत्खनन उनके अस्तित्व के लिए एक बड़ा खतरा है, जो नदी के पारिस्थितिकी तंत्र को नष्ट कर रहा है, जैव-विविधता को कम कर रहा है, जलभराव क्षमता को कम कर रहा है और पानी की गुणवत्ता को प्रभावित कर रहा है। यह न केवल पानी के प्रवाह को बदलता है, बल्कि किनारे के कटाव, भूस्खलन और नदी की गहराइयों को बढ़ाकर बाढ़ के जोखिम को भी बढ़ाता है। रेत के खनन से जलीय सूक्ष्मजीवों के आवास नष्ट हो जाते हैं जो नदी के p H स्तर को नियंत्रित करते हैं, रेत-खनन से जलीय पौधे, सूक्ष्मजीव, मछलियाँ और अन्य जलचर विलुप्त होने की कगार पर पहुँच रहे हैं, वहीं नदी के तल का आकार बदल रहा है जिससे नदी का प्रवाह प्रभावित हो रहा है, वहीं
रेत खनन से नदी में पानी का तापमान बढ़ जाता है, जिससे जल का मैलापन बढ़ जाता है और ऑक्सीजन कम हो जाती है, जो मछलियों के लिए हानिकारक है तथा जलस्तर में कमी का कारण बन गया कम है, जो आसपास के भूजल स्तर को भी प्रभावित कर रहा है। नदी के किनारे के कटाव के कारण बाढ़ का खतरा बढ़ गया है, जो आसपास की बस्तियों के लिए खतरनाक है।
तेजी से बढ़ते शहरीकरण और निर्माण कार्यों के कारण रेत जो एक प्राकृतिक संसाधन है उसकी मांग बढ़ रही है, अतः प्रशासन को रेत के विकल्पों की खोज के साथ-साथ, वैज्ञानिक और जिम्मेदारीपूर्ण तरीके से रेत निकालने की आवश्यकता है। सरकार को अवैध रेत खनन के खिलाफ सख्त कार्यवाही करनी चाहिए और रेत के डिपो बनाकर उसे बेचना चाहिए। नदियों के संरक्षण के लिए स्थानीय समुदायों को जागरूक करना आवश्यक है, ताकि वे रेत के अवैध खनन का विरोध कर सकें। प्रशासन को रेत की खनन गतिविधियों को विनियमित करना चाहिए और सुनिश्चित करना चाहिए कि वे नदियों को नुकसान न पहुँचाएँ। अवैध रेत खनन से न केवल नदियां सूख रही हैं, बल्कि वे एक विनाशकारी मार्ग पर भी ले जा रही हैं, जो न केवल पर्यावरण के लिए, बल्कि मानव अस्तित्व के लिए भी खतरा है।