
कटनी : मुनाफे की दौड़ में अगर इंसान की सेहत दांव पर लग जाए, तो सवाल सिर्फ मिलावट का नहीं, बल्कि जिम्मेदारी और सिस्टम की निगरानी का भी है।देश की जानी-मानी कंपनी डाबर इंडिया के खाद्य उत्पादों पर ‘100% Pure’, ‘100% Natural’ और ‘100% Purity Guaranteed’ जैसे दावों को लेकर भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण यानी FSSAI ने आपत्ति जताई और ऐसे दावों वाले उत्पादों की बिक्री पर रोक लगाने का आदेश जारी किया। हालांकि दिल्ली हाईकोर्ट ने 7 अगस्त को इस आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है। यानी मामला अभी न्यायिक विचाराधीन है।वहीं मध्यप्रदेश के इंदौर में खाद्य सुरक्षा विभाग की जांच में हजारों किलो घी संदिग्ध पाए जाने पर जब्त किया गया है। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है—आखिर आम आदमी जिस खाद्य सामग्री को भरोसे के साथ खरीद रहा है, उसकी शुद्धता की गारंटी कौन देगा?इंदौर में खाद्य सुरक्षा विभाग की टीम ने अलग-अलग प्रतिष्ठानों पर जांच करते हुए 2,165 किलो से ज्यादा घी जब्त किया, जिसकी अनुमानित कीमत करीब 12 लाख 21 हजार रुपये बताई गई है।सुदामा नगर स्थित श्री एंटरप्राइजेज से 1,115.4 किलो घी, जबकि तालावली चांदा स्थित दुग्गू एंटरप्राइजेज से 1,050 किलो घी जब्त किया गया।श्री एंटरप्राइजेज को वैध खाद्य लाइसेंस के बिना संचालन के चलते बंद भी कराया गया। दुग्गू एंटरप्राइजेज से जब्त घी गुजरात से आया बताया गया है और उसकी गुणवत्ता की जांच के लिए नमूने लिए गए।यहीं मामला खत्म नहीं होता।खाद्य सुरक्षा टीम ने किशनलाल मायाराम प्राइवेट लिमिटेड और सतगुरु मिल्क प्रोडक्ट्स, पीलोग्राउंड में भी जांच की और दूध, पनीर, मावा तथा मिठाइयों के नमूने लिए।यानी दूध से लेकर घी तक और पनीर से लेकर मिठाइयों तक—खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता पर लगातार निगरानी की जरूरत महसूस हो रही है।दूसरी तरफ डाबर इंडिया के मामले ने ब्रांडेड उत्पादों पर उपभोक्ता के भरोसे को लेकर बहस छेड़ दी है।FSSAI ने डाबर के कुछ खाद्य उत्पादों पर ‘100% Pure’, ‘100% Natural’, ‘100% Organic’ और इसी तरह के दावों को नियमों के विपरीत और उपभोक्ताओं को भ्रमित करने वाला माना था।लेकिन यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि FSSAI की कार्रवाई को सीधे तौर पर डाबर के उत्पादों में मिलावट साबित होना नहीं कहा जा सकता। दिल्ली हाईकोर्ट ने 7 अगस्त को FSSAI के आदेश पर अंतरिम रोक लगाई है और मामला अभी अदालत के सामने है।इन घटनाओं से एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा होता है—जब उपभोक्ता ब्रांड, पैकेजिंग और ‘शुद्धता’ के दावों पर भरोसा करके खाद्य पदार्थ खरीदता है, तो उस भरोसे की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?जरूरत है कि खाद्य पदार्थों की जांच केवल त्योहारों या विशेष अभियानों तक सीमित न रहे, बल्कि पूरे साल नियमित और वैज्ञानिक तरीके से नमूने लिए जाएं।मिलावट या खाद्य सुरक्षा नियमों का उल्लंघन पाए जाने पर दोषियों के खिलाफ कानून के मुताबिक कठोर और समयबद्ध कार्यवाही होनी चाहिए।क्योंकि सवाल सिर्फ एक पैकेट, एक बोतल या एक किलो घी का नहीं है…सवाल करोड़ों लोगों की थाली और उनकी सेहत का है।खाद्य उत्पादों की न सिर्फ नियमित जांच होनी चाहिए बल्कि इसके लिए एक अलग से मंत्रालय ही बनाकर ठोस कार्यवाही की जानी सुनिश्चित की जानी चाहिए और मिलावटखोरों पर गैर इरादतन हत्या का मुकदमा दर्ज किया जाना चाहिए।
