
135 मुख्य नगरपालिका अधिकारी भी शामिल, 7 बर्खास्त; 3 से 4 करोड़ रुपये की वसूली, 80 से अधिक ठेकेदारों और सप्लायर्स पर कार्रवाई
भोपाल। मध्यप्रदेश में नगरीय निकायों की सरकारी खरीदी में कथित वित्तीय अनियमितताओं को लेकर राज्य सरकार ने सख्त रुख अपनाया है। सरकारी धन के इस्तेमाल में गड़बड़ी, वस्तुओं की खरीद में दरों के भारी अंतर और नियमों के उल्लंघन से जुड़े मामलों में लगभग 392 अधिकारी-कर्मचारी कार्रवाई या जांच के दायरे में हैं। इनमें करीब 135 मुख्य नगरपालिका अधिकारी (सीएमओ) भी शामिल हैं। नगरीय विकास एवं आवास विभाग के अपर मुख्य सचिव संजय दुबे के मुताबिक, अब तक सात अधिकारियों को सेवा से बर्खास्त किया जा चुका है, जबकि लगभग 3 से 4 करोड़ रुपये की वसूली की गई है। इसके अलावा 80 से अधिक ठेकेदारों और सप्लायर्स के विरुद्ध भी कार्रवाई की गई है। विभाग ने स्पष्ट किया है कि अनियमितताओं के मामलों में जांच और कार्रवाई की प्रक्रिया जारी रहेगी।तीन साल में 1,134 करोड़ रुपये की खरीदी की जांचइस पूरे मामले का प्रमुख आधार प्रदेश के 374 नगरीय निकायों द्वारा सरकारी ई-मार्केटप्लेस (GeM) पोर्टल के माध्यम से की गई खरीदी का विश्लेषण है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, इन निकायों ने बीते तीन वर्षों में लगभग 1,134 करोड़ रुपये की खरीदारी की। विभागीय प्रस्तुतीकरण में अनुमान जताया गया कि यदि समान वस्तुएं औसत दरों पर खरीदी जातीं, तो लगभग 200 से 250 करोड़ रुपये तक की बचत संभव थी।यह अनुमानित बचत है, प्रमाणित वित्तीय नुकसान नहीं। वास्तविक अनियमितता निर्धारित करने के लिए संबंधित वस्तुओं की गुणवत्ता, तकनीकी विशिष्टताओं, खरीदी की मात्रा, परिवहन एवं स्थापना लागत, बिलों और भुगतान अभिलेखों की जांच आवश्यक होगी।
दो लाख का कचरा वाहन छह लाख में खरीदने का उदाहरण
सरकारी प्रस्तुतीकरण में अलग-अलग नगरीय निकायों में समान या मिलती-जुलती वस्तुओं की खरीद दरों में बड़े अंतर के उदाहरण सामने आए हैं। एक निकाय में कचरा संग्रहण वाहन लगभग दो लाख रुपये में खरीदे जाने की जानकारी दी गई, जबकि दूसरे निकाय में चार डस्टबिन सहित ऐसे ही वाहन की कीमत करीब छह लाख रुपये बताई गई।इसी तरह, 60 वॉट की एलईडी लाइट की खरीद एक स्थान पर लगभग 306 रुपये में, जबकि भोपाल में एक खरीद के दौरान इसकी कीमत लगभग 11,800 रुपये दर्ज होने की बात सामने आई। एक अन्य उदाहरण में फिनाइल अथवा कीटाणुनाशक की दर एक निकाय में पांच रुपये प्रति लीटर और दूसरे में लगभग 33,500 रुपये तक बताई गई।इन आंकड़ों ने सरकारी खरीद प्रक्रिया की निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। हालांकि, इन दरों के अंतर को अपने आप भ्रष्टाचार का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता। उत्पादों की वास्तविक समानता, पैकेजिंग, गुणवत्ता, मात्रा और अन्य लागतों का मिलान करने के बाद ही किसी मामले में जिम्मेदारी तय की जा सकती है।
एआई और डिजिटल रिकॉर्ड से पकड़ी जा रही विसंगतियां
विभागीय निगरानी में तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) की मदद ली जा रही है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, नगरीय प्रशासन विभाग GeM पोर्टल के खरीद रिकॉर्ड का ई-नगरपालिका सॉफ्टवेयर में दर्ज भुगतान एवं वित्तीय लेनदेन से मिलान कर रहा है।इस व्यवस्था के माध्यम से यह देखा जा सकता है कि किसी निकाय ने कौन-सी वस्तु खरीदी, कितनी मात्रा में खरीदी, किस विक्रेता से खरीदी और किस दर पर भुगतान किया। अलग-अलग निकायों में एक ही वस्तु की कीमतों की तुलना कर असामान्य अंतर वाले मामलों को चिह्नित किया जा सकता है।इसके अलावा, निविदाओं को छोटे-छोटे हिस्सों में बांटकर निर्धारित वित्तीय सीमाओं या स्वीकृति संबंधी नियमों से बचने की संभावनाओं की भी जांच की जा सकती है। हालांकि, तकनीकी प्रणाली किसी संदिग्ध लेनदेन की पहचान करने में मदद करती है; अंतिम निष्कर्ष जांच और संबंधित अभिलेखों के परीक्षण के बाद ही निकाला जाना चाहिए।
किस तरह की कार्रवाई की गई?
अपर मुख्य सचिव संजय दुबे द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, वित्तीय अनियमितताओं से जुड़े मामलों में अलग-अलग स्तरों पर कार्रवाई की गई है। इसमें राशि की वसूली, वेतनवृद्धि रोकना, पदावनति और गंभीर मामलों में सेवा से बर्खास्तगी जैसे कदम शामिल हैं।अब तक सात अधिकारियों को सेवा से बर्खास्त किए जाने की जानकारी दी गई है। लगभग 3 से 4 करोड़ रुपये की वसूली की गई है, जबकि 80 से अधिक ठेकेदारों और सप्लायर्स के खिलाफ भी कार्रवाई की गई है। विभाग का कहना है कि संबंधित मामलों में अनियमितता की गंभीरता और जिम्मेदारी के अनुसार कदम उठाए जा रहे हैं।यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि 392 अधिकारी-कर्मचारी जांच अथवा कार्रवाई के दायरे में बताए गए हैं, जबकि 146 अधिकारियों-कर्मचारियों के विरुद्ध कार्रवाई किए जाने की अलग जानकारी भी सामने आई है। दोनों आंकड़े अलग-अलग स्थिति को दर्शाते हैं। प्रत्येक मामले का अंतिम परिणाम और निकायवार विवरण सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी में स्पष्ट नहीं है।
जनता के पैसे का उपयोग जनता के हित में हो
नगरीय निकायों का बजट केवल सरकारी अनुदान तक सीमित नहीं होता। निकाय अपने राजस्व से भी सफाई, प्रकाश व्यवस्था, कचरा प्रबंधन, सड़क, जल निकासी और दूसरी नागरिक सुविधाओं पर खर्च करते हैं। ऐसे में खरीद प्रक्रिया में अनावश्यक खर्च या वित्तीय अनियमितता की आशंका सीधे तौर पर नागरिक सेवाओं के लिए उपलब्ध संसाधनों पर असर डाल सकती है।अपर मुख्य सचिव संजय दुबे ने कहा है कि सरकार का स्पष्ट उद्देश्य जनता के पैसे का पारदर्शी उपयोग सुनिश्चित करना और उसका लाभ नागरिकों तक पहुंचाना है। उन्होंने संकेत दिया है कि अनियमितताओं और लापरवाही के मामलों में कार्रवाई जारी रहेगी तथा गंभीरता के अनुरूप जिम्मेदारी तय की जाएगी।
उच्चस्तरीय जांच और जवाबदेही पर भी नजर
सरकारी खरीद में मूल्य संबंधी विसंगतियों को लेकर विभागीय बैठक का वीडियो सार्वजनिक होने के बाद यह मामला चर्चा में आया। नगरीय विकास एवं आवास विभाग की राज्यमंत्री प्रतिमा बागरी ने भी उपलब्ध समाचार रिपोर्टों के अनुसार, वायरल वीडियो में उठाए गए मुद्दों की उच्चस्तरीय जांच कराने और दोषी पाए जाने वालों के विरुद्ध कार्रवाई करने की बात कही थी।अब इस मामले में महत्वपूर्ण सवाल यह है कि चिह्नित खरीद में वास्तविक अनियमितता कितनी थी, कितनी राशि का नुकसान प्रमाणित होता है, वसूली की कार्रवाई किस स्तर तक पहुंची है और किन मामलों में अंतिम विभागीय अथवा कानूनी निर्णय हुए हैं। इन बिंदुओं पर निकायवार जांच रिपोर्ट और कार्रवाई का विवरण सामने आने से पूरे प्रकरण की तस्वीर अधिक स्पष्ट होगी।फिलहाल, प्रदेश सरकार की इस कार्रवाई को नगरीय निकायों में वित्तीय अनुशासन मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। अब निगाहें जांच के निष्कर्षों पर हैं, ताकि संदिग्ध खरीद और प्रमाणित अनियमितताओं के बीच स्पष्ट अंतर सामने आए तथा सरकारी धन के उपयोग में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित हो सके।
