
उत्सव और शादी समारोह में बढ़ती ध्वनि प्रतियोगिता स्वास्थ्य के लिए चिंता का विषय, कलेक्टर से पहले ही गाइडलाइन जारी करने की मांग

कटनी। नवरात्रि और दुर्गोत्सव का पर्व सामने है। इसके साथ ही शहर और ग्रामीण क्षेत्रों में धार्मिक आयोजनों, जुलूसों, शादी-ब्याह और अन्य समारोहों में डीजे तथा बड़े साउंड सिस्टम के इस्तेमाल का सिलसिला भी बढ़ने वाला है। ऐसे में तेज आवाज को लेकर प्रशासन द्वारा समय रहते स्पष्ट गाइडलाइन जारी करने की जरूरत महसूस की जा रही है।

आज स्थिति यह है कि कई आयोजनों में डीजे की आवाज को लेकर एक तरह की प्रतियोगिता देखने को मिलती है। सवाल यह है कि आखिर किस स्तर तक तेज आवाज को मनोरंजन माना जाए और किस स्तर के बाद यह आम नागरिकों के स्वास्थ्य और शांति के लिए समस्या बन जाती है?

भारत सरकार के Noise Pollution (Regulation and Control) Rules, 2000 के अनुसार ध्वनि की अधिकतम स्वीकार्य सीमा क्षेत्र के आधार पर निर्धारित है। आवासीय क्षेत्र में दिन के समय 55 और रात में 45 डेसिबल, जबकि व्यावसायिक क्षेत्र में दिन में 65 और रात में 55 डेसिबल की सीमा निर्धारित है। साइलेंस जोन के लिए यह सीमा दिन में 50 और रात में 40 डेसिबल है।
नियमों के मुताबिक लाउडस्पीकर या पब्लिक एड्रेस सिस्टम के इस्तेमाल के लिए संबंधित प्राधिकरण से लिखित अनुमति आवश्यक है। सामान्य तौर पर रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक लाउडस्पीकर और ध्वनि उत्पन्न करने वाले उपकरणों के इस्तेमाल पर प्रतिबंध है। हालांकि राज्य सरकार निर्धारित शर्तों के साथ सांस्कृतिक, धार्मिक या त्योहारों के सीमित अवसरों पर रात 10 बजे से मध्यरात्रि 12 बजे तक अधिकतम 15 दिनों के लिए छूट दे सकती है।

स्वास्थ्य की दृष्टि से भी अत्यधिक शोर को हल्के में नहीं लिया जा सकता। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार अत्यधिक पर्यावरणीय शोर नींद में बाधा, सुनने की क्षमता पर असर, टिनिटस, मानसिक तनाव और हृदय संबंधी जोखिमों से जुड़ा हुआ है। WHO ने तेज संगीत और अन्य मनोरंजन गतिविधियों से होने वाले शोर को भी पर्यावरणीय शोर के स्रोतों में शामिल किया है।

यानी मामला सिर्फ यह नहीं है कि डीजे की आवाज किसे पसंद है और किसे नहीं। मामला यह है कि क्या आयोजन के दौरान निर्धारित ध्वनि मानकों का पालन हो रहा है या नहीं।

अब सवाल जिला प्रशासन से है—
क्या नवरात्रि और आगामी त्योहारी सीजन को देखते हुए जिला प्रशासन पहले से ही सभी डीजे संचालकों, आयोजकों, मैरिज गार्डन और धार्मिक समितियों के लिए स्पष्ट आमसूचना जारी करेगा?
क्या प्रत्येक डीजे और साउंड सिस्टम को निर्धारित ध्वनि सीमा के भीतर रखने के लिए साउंड लिमिटर और कैलिब्रेटेड साउंड लेवल मीटर से जांच की व्यवस्था की जाएगी?
क्या अस्पतालों, स्कूलों, न्यायालयों और अन्य संवेदनशील क्षेत्रों के आसपास विशेष निगरानी की जाएगी? नियमों में अस्पताल, शिक्षण संस्थान और न्यायालयों के आसपास कम से कम 100 मीटर क्षेत्र को साइलेंस जोन के रूप में अधिसूचित किए जाने का प्रावधान है।
और सबसे महत्वपूर्ण—क्या प्रशासन डीजे संचालकों के उपकरणों की क्षमता, अनुमति और वास्तविक ध्वनि स्तर की जांच के लिए विशेष अभियान चलाएगा?

जनहित की मांग यह नहीं है कि धार्मिक आयोजन या विवाह समारोहों पर रोक लगे। मांग सिर्फ इतनी है कि उत्सव की खुशी किसी दूसरे नागरिक के स्वास्थ्य और शांति की कीमत पर न हो।
बड़े साउंड सिस्टम और अत्यधिक शक्तिशाली स्पीकरों को लेकर भी प्रशासन को तकनीकी और कानूनी परीक्षण के आधार पर व्यवस्था बनानी चाहिए। केवल स्पीकर के 15 इंच या उससे अधिक होने को अपने आप में अपराध मानने के बजाय, उसके वास्तविक ध्वनि उत्पादन, अनुमति और निर्धारित dB(A) सीमा के अनुपालन की जांच अधिक वैज्ञानिक और नियमसम्मत तरीका होगा।

मध्यभारत टुडे न्यूज की जिला प्रशासन से मांग है कि नवरात्रि शुरू होने से पहले ही स्पष्ट आमसूचना जारी की जाए, डीजे संचालकों की बैठक लेकर नियम समझाए जाएं, संवेदनशील क्षेत्रों की सूची सार्वजनिक की जाए और निर्धारित सीमा से अधिक ध्वनि पाए जाने पर तत्काल वैधानिक कार्रवाई की जाए।
क्योंकि त्योहार मनाना सबका अधिकार है… लेकिन किसी की खुशी दूसरे की सेहत और सुकून पर भारी नहीं पड़नी चाहिए।
