108 मौजूद, फिर निजी एंबुलेंस क्यों?मरीज नहीं, फिर भी बढ़ा किलोमीटर? फर्जी ट्रिप के आरोपों से 108 सेवा पर सवाल, एंबुलेंस सेवा में खेल के आरोप?

सरकारी 108 एंबुलेंस की मौजूदगी के बावजूद निजी वाहनों का इस्तेमाल? मरीजों की कथित फर्जी रिपोर्टिंग से किलोमीटर बढ़ाने के आरोप, डीजे साउंड बॉक्स और एलईडी लाइट ने भी उठाए सवाल

कटनी। जिले में संचालित 108 एंबुलेंस सेवा के संचालन और निगरानी व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल सामने आए हैं। आरोप लगाया जा रहा है कि शासकीय 108 एंबुलेंस सेवा उपलब्ध होने के बावजूद कुछ मामलों में मरीजों को लाने के लिए निजी एंबुलेंस का इस्तेमाल किया जा रहा है। वहीं कुछ वाहनों की ट्रिप को लेकर कथित तौर पर ऐसी रिपोर्टिंग किए जाने की बात सामने आई है, जिसमें मरीज नहीं मिलने अथवा मरीज के नहीं आने का उल्लेख किया गया, जबकि उसी दौरान संबंधित वाहन द्वारा अन्य स्थानों से मरीजों को ले जाने का आरोप है।यदि शिकायत में लगाए गए आरोप जांच में सही पाए जाते हैं, तो मामला केवल एंबुलेंस सेवा के संचालन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सरकारी भुगतान, ट्रिप की वास्तविकता, किलोमीटर लॉग और निगरानी व्यवस्था की पारदर्शिता पर भी गंभीर सवाल खड़े हो सकते हैं।

चार एंबुलेंस वाहनों के संचालन पर विशेष सवाल

मामले में CG 04 NW 6365, CG 04 NW 6368, CG 04 NS 4279 और CG 04 NS 7468 नंबर वाले वाहनों के संचालन को लेकर विशेष रूप से सवाल उठाए गए हैं। शिकायत के अनुसार, कुछ वाहनों द्वारा जिला अस्पताल में मरीज को लाने के नाम पर एंट्री कराए जाने के बाद अस्पताल परिसर से निकलकर निजी अस्पतालों से मरीज लेने और उन्हें दूसरे जिलों तक पहुंचाने की बात कही जा रही है।आरोप यह भी है कि बाद में संबंधित ट्रिप की रिपोर्टिंग में मरीज के नहीं मिलने अथवा मरीज के नहीं आने की जानकारी दर्ज की जाती है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है। ऐसे में पूरे मामले की वास्तविकता संबंधित रिकॉर्ड की जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।अलग-अलग मोबाइल आईडी से ट्रिप जनरेट करने का आरोपशिकायत में कुछ वाहनों को अलग-अलग मोबाइल नंबरों अथवा आईडी से संचालित किए जाने का भी आरोप लगाया गया है। आरोप है कि इस प्रक्रिया के माध्यम से बिना वास्तविक मरीज के भी वाहन चलाकर किलोमीटर बढ़ाया जा सकता है।यदि ऐसा कोई सिस्टम इस्तेमाल हुआ है तो इसकी जांच तकनीकी रिकॉर्ड के माध्यम से आसानी से की जा सकती है। संबंधित वाहनों की जीपीएस लोकेशन, ट्रिप हिस्ट्री, कॉल लॉग, मरीज की वास्तविक जानकारी, अस्पताल में प्रवेश का रिकॉर्ड और किलोमीटर लॉग का मिलान किया जाए तो स्थिति काफी हद तक स्पष्ट हो सकती है।एंबुलेंस में डीजे साउंड बॉक्स और एलईडी लाइट क्यों?मामले में एंबुलेंस वाहनों में कथित तौर पर लगाए गए डीजे साउंड बॉक्स और एलईडी लाइट भी चर्चा का विषय बने हुए हैं। आपातकालीन मरीजों के परिवहन के लिए निर्धारित वाहनों में इस प्रकार के अतिरिक्त उपकरण किस अनुमति और उद्देश्य से लगाए गए हैं, यह भी जांच का विषय होना चाहिए।इसके अलावा कुछ वाहनों की नंबर प्लेट को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। नंबर प्लेट पर कथित छेड़छाड़, नंबर के खुरचे होने अथवा उसके ऊपर अतिरिक्त एलईडी लाइट लगाए जाने जैसी शिकायतों की भी परिवहन विभाग और संबंधित स्वास्थ्य अधिकारियों द्वारा जांच कराई जानी चाहिए।

एंबुलेंस के भीतर कैमरे, मरीजों की निजता का सवाल

एंबुलेंस के अंदर लगे कथित कैमरों को लेकर भी संवेदनशील सवाल उठ रहे हैं। खासतौर पर महिला मरीजों, प्रसूता महिलाओं और गंभीर स्वास्थ्य परिस्थितियों में मरीजों की निजता बेहद महत्वपूर्ण होती है।यदि एंबुलेंस के अंदर कैमरे लगे हैं और लगातार रिकॉर्डिंग की जाती है, तो यह स्पष्ट किया जाना आवश्यक है कि कैमरों का एंगल क्या है, रिकॉर्डिंग कहां सुरक्षित होती है, फुटेज तक किन लोगों की पहुंच है और संवेदनशील परिस्थितियों में मरीज की निजता एवं गरिमा की सुरक्षा के लिए क्या व्यवस्था निर्धारित है।मामले की जांच के दौरान कैमरों की स्थापना और रिकॉर्डिंग व्यवस्था की भी समीक्षा किए जाने की मांग उठ रही है।

चालकों की योग्यता और उम्र पर भी सवाल

कुछ वाहनों को कथित तौर पर ऐसे चालकों द्वारा संचालित किए जाने की शिकायत भी सामने आई है, जिनके पास वैध ड्राइविंग लाइसेंस नहीं होने अथवा उनकी उम्र निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं होने का आरोप लगाया जा रहा है।आपातकालीन सेवा में एंबुलेंस चालक की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। इसलिए प्रत्येक चालक के ड्राइविंग लाइसेंस, आयु, प्रशिक्षण, नियुक्ति रिकॉर्ड और ड्यूटी रोस्टर का सत्यापन कराया जाना जरूरी है। यदि किसी चालक के संबंध में नियमों का उल्लंघन पाया जाता है तो मरीजों की सुरक्षा को देखते हुए तत्काल उचित कदम उठाया जाना चाहिए।

जीपीएस और कॉल लॉग से खुल सकता है पूरा मामला

शिकायत में लगाए गए आरोपों की निष्पक्ष जांच के लिए पिछले कुछ महीनों के रिकॉर्ड की तकनीकी जांच सबसे महत्वपूर्ण साबित हो सकती है। संबंधित वाहनों के जीपीएस डेटा को 108 कॉल सेंटर के रिकॉर्ड, ट्रिप शीट और अस्पताल के रिकॉर्ड से मिलाया जाए तो यह पता लगाया जा सकता है कि वाहन वास्तव में किस स्थान पर गया था और उस दौरान उसके साथ मरीज था या नहीं।इसके अलावा जिला अस्पताल में हुई एंट्री, निजी अस्पतालों से संबंधित मरीज परिवहन, रेफरल रिकॉर्ड, ट्रिप जनरेट करने वाले मोबाइल नंबर और आईडी तथा संबंधित ट्रिप के आधार पर हुए भुगतान की भी जांच आवश्यक है।यदि किसी वाहन की जीपीएस लोकेशन किसी अन्य जिले या निजी अस्पताल में पाई जाती है, जबकि रिकॉर्ड में मरीज नहीं मिलने की रिपोर्ट दर्ज है, तो ऐसे मामलों की अलग से जांच की जा सकती है।निजी अस्पतालों तक मरीज ले जाने के आरोप भी जांच के दायरे में आएंशिकायत में यह भी आरोप है कि कुछ वाहन जिला अस्पताल में मरीज के नाम पर एंट्री के बाद निजी अस्पतालों से मरीज लेकर दूसरे जिलों तक जाते हैं। यदि ऐसा हो रहा है तो यह स्पष्ट होना चाहिए कि संबंधित मरीज को किस आधार पर निजी अस्पताल से दूसरे जिले में ले जाया गया, ट्रिप किस आईडी से बनी, किसने उसे अधिकृत किया और उसका भुगतान किस मद से किया गया।इन सभी सवालों के जवाब दस्तावेजी और डिजिटल रिकॉर्ड के माध्यम से निकाले जा सकते हैं।

जांच में दूध का दूध, पानी का पानी होना जरूरी

108 एंबुलेंस सेवा सीधे आम मरीजों और आपातकालीन स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़ी है। ऐसे में सेवा के संचालन को लेकर सामने आई किसी भी शिकायत को केवल आरोप मानकर नजरअंदाज करने के बजाय रिकॉर्ड आधारित जांच कराना जरूरी है।जांच में जीपीएस रिकॉर्ड, 108 कॉल लॉग, ट्रिप आईडी, मोबाइल नंबर, ट्रिप शीट, मरीजों का विवरण, जिला अस्पताल की एंट्री, रेफरल रिकॉर्ड, निजी अस्पतालों से संबंधित दस्तावेज और भुगतान रिकॉर्ड का आपस में मिलान कराया जाना चाहिए।यदि जांच में फर्जी रिपोर्टिंग, अनावश्यक किलोमीटर बढ़ाने, सरकारी राशि के गलत भुगतान, नियम विरुद्ध वाहन संचालन, चालक की योग्यता में कमी अथवा मरीजों की निजता से संबंधित किसी उल्लंघन की पुष्टि होती है, तो जिम्मेदार लोगों और संबंधित एजेंसी के विरुद्ध नियमानुसार कार्यवाही की जानी चाहिए।स्वास्थ्य विभाग के सामने कई सवालअब सबसे बड़ा सवाल यह है कि सरकारी 108 एंबुलेंस सेवा उपलब्ध होने के बावजूद निजी वाहनों को किन परिस्थितियों में मरीज परिवहन के लिए लगाया गया? संबंधित वाहनों ने कितनी ट्रिप कीं? कितनी ट्रिप में वास्तविक मरीज थे? कितनी ट्रिप में मरीज नहीं मिलने की रिपोर्ट दर्ज हुई? वाहनों ने वास्तव में कितने किलोमीटर की दूरी तय की और उसके आधार पर कितना भुगतान किया गया? इन सवालों का जवाब रिकॉर्ड की जांच से ही सामने आएगा। फिलहाल आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन शिकायत में उठाए गए बिंदु इतने गंभीर हैं कि स्वास्थ्य विभाग और जिला अस्पताल प्रबंधन द्वारा निष्पक्ष एवं तकनीकी जांच कराए जाने की जरूरत महसूस की जा रही है।अब निगाहें इस बात पर हैं कि संबंधित अधिकारी इन शिकायतों पर क्या संज्ञान लेते हैं और जांच के बाद 108 एंबुलेंस सेवा के संचालन को लेकर सामने आई तस्वीर वास्तव में क्या निकलती है।

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