
बिना परमिट क्रूरता पूर्वक परिवहन का खुलासा
कटनी। जिले में पशुओं के अवैध और क्रूरता पूर्वक परिवहन के खिलाफ पुलिस ने बड़ी कार्यवाही करते हुए 263 भेड़-बकरियों से भरे एक ट्रक को पकड़ा है। गुलवारा ब्रिज के ऊपर एनएच-30 पर पकड़े गए ट्रक में बड़ी संख्या में पशुओं को क्षमता से अधिक और कथित तौर पर क्रूरता पूर्वक भरा गया था। पुलिस ने वाहन चालक सहित दो आरोपियों के खिलाफ पशु क्रूरता अधिनियम और मोटर व्हीकल एक्ट की संबंधित धाराओं के तहत प्रकरण दर्ज किया है।
पुलिस के मुताबिक 20 अगस्त को यातायात पुलिस को सूचना मिली थी कि गुलवारा ब्रिज के ऊपर एक ट्रक में बड़ी संख्या में भेड़-बकरियों का परिवहन किया जा रहा है। सूचना पर झिंझरी चौकी पुलिस मौके पर पहुंची। जांच के दौरान ट्रक क्रमांक एमएच-31 एफबी-8433 में भारी संख्या में बकरा, बकरी और भेड़ भरी मिलीं।
पूछताछ में चालक ने अपना नाम शिवा कुशवाहा, पिता राजकुमार कुशवाहा, उम्र 29 वर्ष, निवासी श्यामनगर, थाना नागौद, जिला सतना बताया। पुलिस द्वारा पशुओं के परिवहन से संबंधित वैध दस्तावेज और परमिट मांगे जाने पर चालक कोई वैध दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सका। इसके बाद पुलिस ने ट्रक सहित उसमें लदे कुल 263 पशुओं को जप्त किया।
मामले में वाहन स्वामी अनूप जनार्दन भैसारे को भी आरोपी बनाया गया है। पुलिस ने दोनों के विरुद्ध पशु क्रूरता अधिनियम एवं मोटर व्हीकल एक्ट की संबंधित धाराओं के तहत अपराध पंजीबद्ध कर विवेचना शुरू कर दी है।
कार्यवाही तो हुई, लेकिन बड़े नेटवर्क की जांच जरूरी
यह मामला केवल एक ट्रक और दो आरोपियों तक सीमित है या इसके पीछे कोई संगठित नेटवर्क काम कर रहा है, अब यह जांच का बड़ा विषय बन गया है। स्थानीय स्तर पर सामने आ रही सूचनाओं में उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र तक फैले कथित अंतरराज्यीय पशु परिवहन नेटवर्क की बात कही जा रही है।
बताया जा रहा है कि जबलपुर और कटनी के पन्ना मोड़ क्षेत्र से जुड़े कुछ लोगों के माध्यम से नियमित रूप से पशुओं से भरे ट्रकों को आगे भेजे जाने के आरोप हैं। सूत्रों के अनुसार सप्ताह में कई ट्रकों के जबलपुर और नागपुर के रास्ते हैदराबाद तक जाने की चर्चा है। हालांकि इन दावों की आधिकारिक पुष्टि अभी पुलिस जांच में होना बाकी है।
प्रशासन की निगरानी पर उठे सवाल
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि बड़े पैमाने पर पशुओं का परिवहन लंबे समय से जारी था, तो संबंधित विभागों और स्थानीय प्रशासन की निगरानी व्यवस्था पर नजर क्यों नहीं पड़ी? यदि मार्ग पर नियमित रूप से ऐसे वाहनों की आवाजाही होती है, तो परिवहन, पुलिस, पशुपालन और अन्य संबंधित विभागों की संयुक्त जांच व्यवस्था कितनी प्रभावी है, इसकी समीक्षा भी जरूरी हो जाती है।
सिर्फ एक ट्रक पकड़कर कार्यवाही पूरी मान लेने के बजाय पुलिस और प्रशासन को यह पता लगाने की आवश्यकता है कि पशु कहां से लाए गए, कहां ले जाए जा रहे थे, परिवहन की अनुमति किसने दी, वाहन किसके नाम पर है, इसके पीछे कौन लोग हैं और इस नेटवर्क में अन्य कौन-कौन शामिल हैं।
यदि जांच में लंबे समय से संगठित तरीके से पशुओं के अवैध परिवहन की पुष्टि होती है तो केवल वाहन चालक और वाहन स्वामी तक सीमित कार्यवाही के बजाय पूरे नेटवर्क की कड़ियों तक पहुंचना प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती होगी।
जिम्मेदार विभागों की जवाबदेही भी तय हो
पशुओं के परिवहन से जुड़े नियमों का उल्लंघन रोकना केवल पुलिस की जिम्मेदारी नहीं है। ऐसे मामलों में संबंधित विभागों के बीच समन्वय और नियमित निगरानी बेहद महत्वपूर्ण है। यदि एक ही मार्ग से बार-बार क्षमता से अधिक पशुओं से भरे वाहन गुजर रहे हैं, तो चेकिंग व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
अब देखना यह होगा कि इस मामले की जांच 263 पशुओं की बरामदगी और दो आरोपियों की गिरफ्तारी तक सीमित रहती है या कथित अंतरराज्यीय नेटवर्क की जड़ों तक पहुंचती है। साथ ही यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि पशुओं के अवैध एवं क्रूरता पूर्वक परिवहन की शिकायतों के बावजूद यदि कोई नेटवर्क लंबे समय से सक्रिय था, तो उसे रोकने में संबंधित तंत्र अब तक क्यों विफल रहा।
इनकी रही महत्वपूर्ण भूमिका
कार्यवाही में यातायात थाना प्रभारी निरीक्षक अनूप सिंह, झिंझरी चौकी प्रभारी उप निरीक्षक राजेश कुमार दुबे, सउनि शशिभूषण सिंह, आरक्षक अजय सिंह, आरक्षक चन्द्रकमल पाण्डेय, यातायात स्टाफ सउनि संदीप वाल्मीकि एवं आरक्षक मंजय यादव की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
