
19 माह तक 35 हजार रुपए प्रतिमाह देने का दावा, करीब 6.65 लाख रुपए भुगतान की शिकायत;
लंबित भुगतान रोकने, गाली-गलौज और धमकी के भी आरोप — पुलिस अधीक्षक, नगर निगम आयुक्त, विजिलेंस विभाग जबलपुर व कोतवाली में हुई शिकायत
कटनी। नगर निगम के निर्माण एवं विकास कार्यों की गुणवत्ता को लेकर उठते रहे सवालों के बीच अब एक ठेकेदार की शिकायत ने निगम की कार्यप्रणाली और निर्माण कार्यों की निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। नगर निगम में निर्माण कार्य करने वाले ठेकेदार चंद्रेश शुक्ला ने निगम में पदस्थ सब इंजीनियर पवन श्रीवास्तव के खिलाफ गंभीर आरोप लगाते हुए शिकायत की है। शिकायत में ठेकेदार ने आरोप लगाया है कि नगर निगम से उसे मिले हुए अलग अलग निर्माण कार्यों के बदले कमीशनों को जोड़ जोड़ कर पाँच लाख पचास हजार रुपए खड़े कर दिए और उसकी वापसी के तौर पर कथित रूप से प्रतिमाह 35 हजार रुपए अदा करने के लिए कहा गया।ठेकेदार के अनुसार, आर्थिक दबाव और नगर निगम से उसके लंबित भुगतानों पर असर पड़ने की आशंका के चलते कथित रूप से 35 हजार रुपए प्रतिमाह दिए। शिकायतकर्ता का दावा है कि मई 2026 तक वह लगभग 6 लाख 65 हजार रुपए की राशि अदा कर चुका है। इसके बावजूद अब उससे कथित रूप से साढ़े पांच लाख रुपए वापस करने का दबाव बनाया जा रहा है।
19 महीने तक भुगतान करने का दावा
शिकायत में चंद्रेश शुक्ला ने बताया है कि नगर निगम में किए जा रहे निर्माण कार्यों के बदले उस पर कथित रूप से अतिरिक्त राशि देने का दबाव बनाया गया। शिकायतकर्ता के मुताबिक यदि वह राशि नहीं देता तो नगर निगम से किए गए कार्यों के भुगतान प्रभावित होने का डर था। इसी कथित दबाव के चलते उसने लंबे समय तक प्रतिमाह 35 हजार रुपए की राशि दी।ठेकेदार ने शिकायत में दावा किया है कि लगभग 19 महीने में यह राशि करीब 6 लाख 65 हजार रुपए तक पहुंच गई। शिकायतकर्ता का कहना है कि उसके पास इस लेन-देन से संबंधित साक्ष्य और गवाह भी मौजूद हैं, जिन्हें जांच के दौरान प्रस्तुत किया जा सकता है।रकम देने के बाद भी कथित रूप से बढ़ता रहा दबावशिकायत में आरोप लगाया गया है कि पहले दी गई रकम को लेकर अब भी विवाद बना हुआ है। ठेकेदार का आरोप है कि उसके द्वारा दी गई रकम को मूल रकम के ब्याज के रूप में बताया जा रहा है और उस पर करीब साढ़े पांच लाख रुपए वापस करने का दबाव बनाया जा रहा है।ठेकेदार के अनुसार वर्तमान में उसकी आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण उसने आगे रकम देना बंद कर दिया। इसके बाद उसने आरोप लगाया कि नगर निगम में उसके लंबित भुगतान रोक दिए गए हैं।
सार्वजनिक रूप से अपमानित करने और धमकी देने का आरोप
मामले को और गंभीर बनाते हुए ठेकेदार ने सब इंजीनियर पर सार्वजनिक रूप से गाली-गलौज कर अपमानित करने तथा रकम वापस नहीं करने की स्थिति में जान से मरवाने की धमकी देने का भी आरोप लगाया है।हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है। ऐसे में पूरे मामले की वास्तविक स्थिति पुलिस एवं नगर निगम प्रशासन की जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।
निर्माण कार्यों की गुणवत्ता पर भी उठे सवाल
यह मामला केवल कथित लेन-देन तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे नगर निगम के निर्माण कार्यों की गुणवत्ता पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। यदि ठेकेदार पर निर्माण कार्यों के भुगतान के साथ किसी तरह का अतिरिक्त आर्थिक दबाव बनाया जाता है, तो उसका असर निर्माण की लागत, सामग्री की गुणवत्ता और कार्य की वास्तविक गुणवत्ता पर पड़ने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।ऐसे में सवाल यह भी है कि नगर निगम में निर्माण कार्यों की तकनीकी जांच और भुगतान प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है? क्या प्रत्येक निर्माण कार्य की गुणवत्ता की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच होती है? क्या ठेकेदारों से किसी प्रकार की अनधिकृत राशि की मांग की जाती है? और यदि शिकायत में लगाए गए आरोप सही पाए जाते हैं तो ऐसे मामलों में अब तक निगरानी तंत्र की भूमिका क्या रही?
जांच से सामने आ सकती है पूरी तस्वीर
ठेकेदार ने शिकायत में यह भी संकेत दिया है कि उसके पास कथित भुगतान से संबंधित साक्ष्य और गवाह उपलब्ध हैं। यदि जांच एजेंसियां शिकायत में किए गए दावों की निष्पक्ष जांच करती हैं तो बैंकिंग लेन-देन, भुगतान से संबंधित रिकॉर्ड, नगर निगम के कार्यादेश, माप पुस्तिका, बिल भुगतान की स्थिति, लंबित भुगतान तथा संबंधित निर्माण कार्यों की तकनीकी गुणवत्ता की जांच से मामले की वास्तविकता सामने आ सकती है।शिकायतकर्ता ने मामले की गंभीरता को देखते हुए विजिलेंस विभाग जबलपुर, पुलिस अधीक्षक कटनी, नगर निगम आयुक्त तथा थाना कोतवाली निरीक्षक से शिकायत की है तथा उचित कार्यवाही की मांग की है।
जवाबदेही तय करने की मांग
पूरे मामले में अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि शिकायत में लगाए गए लाखों रुपए के कथित लेन-देन के आरोपों की जांच कब और किस स्तर पर होती है। यदि आरोप निराधार हैं तो जांच के माध्यम से स्थिति स्पष्ट हो सकती है और यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो संबंधित जिम्मेदारों के विरुद्ध नियमानुसार कार्यवाही का रास्ता खुल सकता है।
